रेल यात्रा – 1

“यात्री कृपया ध्यान दें, ट्रेन नंबर 22996, अपने निर्धारित समय में प्लेटफार्म नंबर 1 से रवाना होगी”। आप चाहे हवाई जहाज से, या तो पानी के जहाज, बड़ी बड़ी गाड़ियां इत्यादि से कितना भी सफर कर चुके हों, रेलवे स्टेशन पर इस घोषणा को सुनकर एक खास अनुभूति होती है। रेल का सफर क्योंकि बस अकेले नहीं होता, बल्कि बोगी में बैठे हर व्यक्ति के साथ होता है। सबके डब्बों में बंधे अनेकों व्यंजनों की खुशबू के साथ होता है। घर से दूर जा रहे लोगों की नम आंखों के साथ होता है। और साथ सफर कर रहे चार दोस्तों की हंसी ठिठोलो के साथ होता है। यही कारण है की ट्रेन के सफर में मुझे कभी अकेलापन नहीं होता। और ऐसा ही एक दिन आज है।

आज हमारी बोगी में गजब की रौनक लगी है। आने के साथ ही एक लड़का अपना फोन चार्जिंग में लगाकर चल दिया, ये कहकर की आप देख लेना। ये विश्वास उसी ट्रेन में दिखाया जा रहा था, जहां की शौचालय में पानी का डब्बा भी चैन से बंधा होता है। हमने उसके विश्वास की कदर करते हुए उसे आराम से घूम के आने की आजादी दी। उसका फोन मेरे और मुकेश की निगरानी में सुरक्षित था।

थोड़ी देर बाद इस छोटी सी बोगी में 4 -5 लोगों का सैलाब लग गया। उन्होंने अपने बैग इधर उधर रखे और बैठकर गप्पें चालू करी। इन लोगों में एक लड़की, दो नौजवान, और एक बुजुर्ग थे। बुजुर्गों का भी सफर में साथ होना मजेदार होता है। अलग ही नादानी लिए फिरते हैं वो। जहां नौजवानों की पूरी टोली ने अपने मोबाइल समान रखने के साथ ही निकल दिए, उनके साथ आए बुजुर्ग व्यक्ति सबको देखने लगे, मुस्कुराने लगे, और कुछ कुछ बातें करने लगे।

लगा था की हमारी बोगी अब भर चुकी है, पर तभी एक नवविवाहित जोड़ा बोगी में शामिल हुआ। हाथों में सजी अनगिनत चूड़ियों से ये साफ जाहिर था की ये नए नए दंपति हैं। और इसके बावजूद भी की इनका निजी सफर अभी शुरू ही हुआ है, उनकी बातों से जल्द ही समझ आने लगा की लड़का व्हाट्सएप पर आने वाले तमाम पत्नी-चुटकुलों में महारत है। अगले 10 मिनट में ही उसने अपनी पत्नी की कम तनख्वाह, उसके पड़ने लिखने में ज्यादा ना दिलचस्पी लेने पर चुटकुले, और अपने दोस्त से खुद के लिए सहानुभूति व्यक्त करने वाली वही घिसी पिटी “मजेदार” बातों से हम सब को अनजाने में ही अपने किरदार से रूबरू करवा दिया। ये लाजमी होगा की मुझे बिलकुल मजा नहीं आया।

ट्रेन अब चलने लगी। और पुनः एक हलचल हुई। पता लगा की जो बुजुर्ग व्यक्ति वाला सैलाब आया था, वो तो बस दो लोगों को स्टेशन छोड़ने आए थे। उन्होंने जाते जाते खिड़की से जितनी देर हो सकती थी, तब तक हाथ हिला कर टाटा किया और फिर ओझल हो गए।

और अब हम चल दिए हैं। खुशबू, किस्सों, चिल्लम – चिल्ली ,इत्यादि को साथ लिए, अलग-अलग पर एक साथ। आशा है सफर अच्छा जाएगा। शायद अगली ट्रेन में जब कल बैठूं तो आपको फिर बताऊं की उसमें कौन किरदार साथ थे। क्योंकि उड़ते हवाई जहाजों के बीच, आजकल हम में से कितनों को ही ये धधक-धधक धधक-धधक करती ट्रेन की आवाज सुनने का मौका मिलता है!

10 Comments

  1. So pleasant it makes a feel that travelling in the train may have small things but many noticeable things. So nicely described. 🙂

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