नए समाज का नया मंत्र

पुराने समय में जब शिक्षा का दौर एवं लहर कम थी, प्रायः गुरु की महत्ता बहुत थी। गुरु से मेरा मतलब बस विद्यालय में चौक-डस्टर लिए ज्ञान के भंडारों से नहीं अपितु उन गुरु की है जो शिष्यों को दीक्षा एक मंत्र के रूप में देते थे। यह मंत्र उन्हें अंतरिक्ष में हो रहीं हरकतें, या ईंधन से ऊर्जा निकालने का प्रकाश तो नहीं देता था, अपितु कुछ वचन से मुश्किल दौर का सामना करने की हिम्मत जरूर दे देता था। मंत्र देने का उद्देश्य यह भी था की व्यक्ति इस एक विचार पर ही ध्यान करे। एक विचार पर ही ध्यान करने से वह मंत्र प्रत्यक्ष में प्रमाणित हो जाता है। आधुनिक दौर में दीक्षा का ये रूप लुप्त होता जा रहा है। किन्तु रूप बस दीक्षा देने का लुप्त हुआ है। मंत्र पड़ने का दौर तो राकेट की गति से बढ़ रहा है।
अब कहते हैं ना की मनुष्य को समय की गति से कदम मिला के चलना चाहिए । जैसा समाज वैसा रहन-सहन अपनाना चाहिए । अब यूँ कहिये की ये सब बातें लुप्त होते मन्त्रों की आत्मा ने भी सुन ली एवं अपनी महत्वता बरकरार रखने के लिए मन्त्रों ने अपना रूप एवं स्त्रोत बदल लिया। पहले मंत्र का सार मूलतः होता था “परमात्मा को समर्पित” या “समाज कल्याण के हित में”। मंत्र व्यक्ति विशेष के लिए होते थे तथा हर परिवार का एक मंत्र होता था। अब जब मन्त्रों ने अपना रूप बदला तो उन्होंने व्यक्ति विशेष वाली सभ्यता को बदलने की पहल चली। अब मंत्र एक होना था । रूप, रंग, सामाजिक, आर्थिक स्थिति के परे । एक जगत एक मंत्र । अब समाज की चाल देखते हुए मंत्र के शब्द भी बदल रहे थे । लोगों के अकेलेपन, अपने में खोये रहने की प्रवृत्ति तथा स्वार्थी विचारों की पनपती संख्या को मद्देनज़र रखते हुए एक ही मंत्र सही बैठा “मेरे पास समय नहीं “। जो लोग अंग्रेजी भाषा के शौक़ीन एवं आधीन हैं उनका मंत्र बना “आई ऍम बिजी “। मंत्रो का ये रूप बहुत जल्द ही हवा में फैल गया और बड़े तो क्या बच्चे-बच्चे की ज़बान पे सज गया ।

मंत्र कुछ ऐसा फैला और इस तरह ज़हन में घर बना के बस गया की जल्द ही विचार यथार्थ में बदल गया । समाज की आज परिस्थिति ये है की चाहे काम हो ना हो, हमारे मन में ये हलचल जरूर रहती है की बहुत कम समय है या मेरे पास समय नहीं । इस मंत्र ने आर्थिक का तो कह नहीं सकते किन्तु सामाजिक जीवन का चेहरा बदल दिया है । जीवन में ऐसी हड़कंप मची है । भागते हुए लोगों से सड़कें ठसा-ठस्स भारी हुई हैं । दूब पे पड़ी मरहम ओस की ठंडक , बारिश की पहली बूँद से उठी सौंधी खुशबू, तेज़ गर्मी में पेड़ की छाया, धूल में नहाते गौरैया के झुण्ड, इत्यादि को देखने का समय तो अब सपने में भी नहीं । सवाल यह है की क्या हम वाकई में इतने व्यस्त हैं? या क्या यह बस जीवन प्रणाली का भाग बन गया है? अगर हाँ, तो क्या यह एक प्रबल समाज की पहचान है, या एक ठूंठ से खड़े बबूल के वृक्ष के सामान है जो बढ़ता तो गया किन्तु ना पंथी को छाँव दे सका ना भूखे को फल?

15 Comments

  1. Wow amazing and so authentic to read and feel… Really no one is free especially in the metropolitan areas but if the writer comes to stay in the country side she will know that one thing she missed out was that mobile has taken that idle time as well which was supposed to be for the nature..but the poor farmer is still doing the same redundant job he did 100 years back and the youths are decaying. You can make it more sub altern and elaborate although it’s already so well written.

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  2. This is so relatable in today’s life and to our inter personal thoughts. You weave words in thoughts so smoothely! Appreciate and love.

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  3. Liked the truth this blog takes our attention to, A rat race ppl believe they do not have time and a lot to do. But st this belief they miss to live the present.

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  4. Really appreciative Aali….and the best part is… Aankh kholney wali sachhai ko dikhaney K sath sath Hindi bhasha ka bahut hi utkrisht tareeke s prayog kiya h ….keep going Aali…😊😊

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  5. Aali you have joted down the reality and given a peaceful message to all readers that enjoy the little things in life. Very well written. Keep posting more articles.

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